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Tuesday, November 9, 2010

होरी -देश की उन्नति का मेरुदंड ।(शीर्षक)

भूमिका

साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है।हिंदी के उपन्यास सम्राट-
श्री मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं में भी तत्कालीन सामाजिक स्थिति
का परिचय मिलता है।उन्होने अपनी सारी रचनाओं में उस समय
की प्रायः सभी समस्याओं की चर्चा की है।'गोदान 'प्रेमचंद का एक
ऐसा उपन्यास है,जिसमें कर्षक वर्ग की प्रमुख समस्याओं का चित्रण
मार्मिक ढंग से किया हैं।होरी और धनिया इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं।

विश्लेषण
प्रेमचंद ने अपने उपन्यास के नायक होरी का चित्रण सारी स्वाभाविकता
से किया है । होरी चालीस साल तक पहूँचा है , लेकिन जीवन की कटुता
ऩे उनको कमज़ोर और बूढा सा बनाया है । अपने चिरस्थायी जीर्णावस्था ने होरी को ज़मीन्दारोँ का गुलाम बना रखा है ।क्योँकि जन्म से किसान होते हुए
भी उसके पास एक बीका ज़मीन तक नहीं ।ज़मीन तो उनके लिए एक सुखद सपना मात्र है ।जीवन की विपरीत परिस्थितियोँ का सामना करते करते उसने यह पाठ सीख लिया कि अपने बचे हुए ज़िंदगी तो ज़मींदारोँ से मिलते जुलते रहने का परसाद है ।
यह उनके ही शब्दोँ में कहें तो- "यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब
तक जान बची हुई है।"
वह जीवन से परास्त होकर अपनी पत्नी को यह तत्व सिखाता है-
"जब दूसरे के पाँव तले अपनी गर्दन दवी हुई है,तो उन पावोँ को सहलाने में ही कुशल है।"
यह वास्तव में एक किसान की त्रासदी है।होरी की यही अवस्था है।

उपसंहार
होरी आम किसान की असली प्रतिनिधि है।
आज भी इसप्रकार की होरी जीवित है ।वह पहले ज़मींदारी प्रथा के गुलाम थे तो आज
समाज के अधिकार वर्ग की घृणा का पात्र है।उनकेलिए वकालत को एक प्रेमचंद थे,
लेकिन आज कोई नहीं रहा है।उनके आचार-विचार,बोलचाल सब ग्रामीण जीवन का
परिचय देता है-जैसे, 'असनान-पूजा,परसाद,पोसाक',आदि।ज़मींदारी व्यवस्था के
शिकार लोग हमारे सभ्यता केलिए प्रशन चिह्न है ।
गान्धी जी ने कहा है कि भारत की आत्मा गावोँ में है ।किसानोँ की उन्नति देश की उन्नति है । प्रेमचंद ने होरी के ज़रिये यह व्यक्त करने का प्रयास किया है ।