धनिया :जलती बुझती कोयला (शीर्षक) (कक्षाःIX)
लेखक परिचयः
हिन्दी के उपन्यास सम्राट श्री प्रेमचंद जी से लिखी गोदान का सशक्त
नायिका है धनिया ।इस उपन्यास में कृषक-वर्ग के प्रायः सभी समस्यायें पाठको
के सामने रखकर धनिया के पात्र द्वारा नारी-गण का एक अलग भाव दिया है उपन्यासकार।
विशेष पात्र परिचय
धनिया एक साधारण औरत थी।वह हमेशा अपनी पति और बच्चोँ के रस-पानी पर
ध्यान रखती हैं।उसका विचार यह था कि मालिक के खेत में जो काम वे करते हैं,
उसका लगान तो उनको ज़रूर देना हैं,देंगे भी।इसके ऊपर मालिक को 'खुशामदकरना',
'तलवे सहलाना' वह पसन्द नहीं करती। उनके ही शब्दोँ में--"आज न जावोगे तो कौन
हरज होगा। अभी तो परसोँ गए थे"।उसने अपने अनुभवोँ से यह सीख लिया कि
कितना मेहनत करें कितना पेट-तन काटोँ लेकिन कर्ज चुकाना बाकी रहेगा।कर्ज में
जीकर उसीमें मरना पडेगा।उनकी चिंता तो यह थी कि जिन व्यक्तियोँ से कोई लाभ
नहीं उनकी पूजा करना मूर्खता है।जीवन से लडना वह ज़रूर चाहती है लेकिन अंत में
परास्त हो जाती है।ज़िन्दगी के बारे में जो सुन्दर सपने देखी थी उनमें पानी फिरते देख
उनकी आखें सजल हो जाती है।मरे तीन सर्तानोँ की याद से वह काफी थक जाती है।
उनकी चिकित्सा में जो असमर्थता हुई वह उसके दुख की तीव्रता बढाती रहती है।इसी
दुःख ने ३६ उम्र की धनिया को बूढी सा रूप दिया है.।ज़िन्दगी के बारे में उसके दिल में
जो मान्यता थी,चिरस्थाई जीर्णावस्था ने उस मान्यता को उदासीनता में बदल दिया है।वह
सचमुच यह जानती थी कि इन सब बुरी हालतोँ का कारण इस ज़मीन्दारी प्रथा है।इन बातें
होरी को कई बार समझने में वह असफल बन जाती है।
उपसंहार
भारतीय गृहस्थी में पुरुष का ही वर्चस्व है।इसलिए कितना ही विद्रोह करें,अन्त में जीत
होरी को ही होती है।उसने परास्त होकर होरी की लाठी,मिरजयी,जूते,पगडी और तमाखू की
बटुआ लाकर सामने पटक दिया ।गृहस्थी और खेती को लेकर गंभीर नज़र रखनेवाला होरी
भी बीचबीच में धनिया के प्यार के आगे नरम और प्यारा हो जाता है।इसी कारण गरीबी मे
भी वे ' संतुष्ट ' दिखाई देते है ।आज भी धनिया हमारे बीच ज़िन्दा है ।उनकी भाषा भी
ग्रामीणता की ओर हमें ले जाते है ।जैसे रस-पानी , असुभ कोसना आदि ।
सारी मुसीबतोँ को सह-सहकर क्षण भर की खुशी भी न मिलने वाली धनिया हमारे समाजे में
अब भी है ।लेकिन हम उन्हें पहचानते नहीं ।प्रेमचंद ने नारी के एक अलग चेहरा धनिया
की ओर से हमारे सामने रखा है लेकिन उसका अंत सभी नारियोँ की तरह हुआ है ।
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Friday, November 12, 2010
Monday, November 8, 2010
ज्ञानोदय़
काम करने का सबसे बडा पुरस्कार , अधिक काम करने का अवसर है ।(एड्वेर्ड साल्क)
स्वाभावीक मित्र भाग्य से ही मिलते हैं ।ऐसे मित्र विपत्ती में साथ नहीं छोड़ते ।(नारायण पंडित )
जीवन किसी को स्थायी संपत्ती के रूप में नहीं मिलाहै। (लुकीटस)
जो कमज़ोरे होता है वही सदा रोष करता है । हाथी चींटी से नहीं , चींटी-चींटी से द्वेष करती है ।(गांधिजी )
वास्तव में वे ही श्रेष्ट है , जिनके ह्रदय में सदा दया और धर्म बसता है । (मलूक दास )
काम करने का सबसे बडा पुरस्कार , अधिक काम करने का अवसर है ।(एड्वेर्ड साल्क)
स्वाभावीक मित्र भाग्य से ही मिलते हैं ।ऐसे मित्र विपत्ती में साथ नहीं छोड़ते ।(नारायण पंडित )
जीवन किसी को स्थायी संपत्ती के रूप में नहीं मिलाहै। (लुकीटस)
जो कमज़ोरे होता है वही सदा रोष करता है । हाथी चींटी से नहीं , चींटी-चींटी से द्वेष करती है ।(गांधिजी )
वास्तव में वे ही श्रेष्ट है , जिनके ह्रदय में सदा दया और धर्म बसता है । (मलूक दास )
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